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तू तू मै मै

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तू तू मै मै

बहू और बेटी ,क्या हम दोनों को एक समान देखते है ? कहते तो सब यही है कि बहू हमारी बेटी जैसी है लेकिन हमारा व्यवहार क्या दोनों के प्रति एक सा होता है ? नही ,बहू सदा पराई और बेटी अपनी ,बेटी का दर्द अपना और बहू तो बहू है | अगर सास बहू को सचमुच में अपनी बेटी मान ले तो निश्चय ही बहू के मन में भी अपनी सास के प्रति प्रेमभाव अवश्य ही पैदा हो जायेगा|अपने माँ बाप भाई बहन सबको छोड़ कर जब लड़की ससुराल में आती है तो उसे प्यार से अपनाना ससुराल वालों का कर्तव्य होता है ,लेकिन ऐसा हो नही पाता,यह सोच मोहन बाबू बहुत परेशान है |

आज तो सुबह सुबह ही घर में लड़ने झगड़ने की जोर जोर से आवाजें आने लगी ,लो जी आज के दिन की अच्छी शुरुआत हो गई सास बहू की तकरार से ,मोहन बाबू अपना माथा पकड़ कर बैठ गए ,ऐसा क्यों होता है जिस बहू को हम इतने चाव और प्यार से घर ले कर आते है फिर पता नही क्यों और किस बात से उसी से न जाने किस बात से नाराजगी हो जाती है |जब मोहन बाबू के इकलौते बेटे अंशुल की शादी एक ,पढ़ी लिखी संस्कारित परिवार की लड़की रूपा से हुई थी तो घर में सब ओर खुशियों की लहर दौड़ उठी थी ,मोहन बाबू ने बड़ी ईमानदारी और अपनी मेहनत की कमाई से अंशुल को डाक्टर बनाया ,मोहन बाबू की धर्मपत्नी सुशीला इतनी सुंदर बहू पा कर फूली नही समा रही थी लेकिन सास और बहू का रिश्ता भी कुछ अजीब सा होता है और उस रिश्ते के बीचों बीच फंस के रह जाता है बेचारा लड़का ,माँ का सपूत और पत्नी के प्यारे पतिदेव ,जिसके साथ उसका सम्पूर्ण जीवन जुड़ा होता है ,कुछ ही दिनों में सास बहू के प्यारे रिश्ते की मिठास खटास में बदलने लगी ,आखिर लडके की माँ थी सुशीला ,पूरे घर में उसका ही राज था ,हर किसी को वह अपने ही इशारों पर चलाना जानती थी और अंशुल तो उसका राजकुमार था ,माँ का श्रवण कुमार ,माँ की आज्ञा का पालन करने को सदैव तत्पर ,ऐसे में रूपा ससुराल में अपने को अकेला महसूस करने लगी लेकिन वह सदा अपनी सास को खुश रखने की पूरी कोशिश करती लेकिन पता नही उससे कहाँ चूक हो जाती और सुशीला उसे सदा अपने ही इशारों पर चलाने की कोशिश में रहती ,कुछ दिन तक तो ठीक रहा लेकिन रूपा मन ही मन उदास रहने लगी , जब कभी दबी जुबां से अंशुल से कुछ कहने की कोशिश करती तो वह भी यही कहता ,”अरे भई माँ है ”और वह चुप हो जाती |

देखते ही देखते एक साल बीत गया और धीरे धीरे रूपा के भीतर ही भीतर अपनी सास के प्रति पनप रहा आक्रोश अब ज्वालामुखी बन चुका था , अब तो स्थिति इतनी विस्फोटक हो चुकी थी कि दोनों में बातें कम और तू तू मै मै अधिक होने लगी |अस्पताल से घर आते ही माँ और रूपा की शिकायतें सुनते सुनते परेशान हो जाता बेचारा अंशुल ,एक तरफ माँ का प्यार और दूसरी ओर पत्नी के प्यार की मार, अब उसके लिए असहनीय हो चुकी थी ,आखिकार एक हँसता खेलता परिवार दो भागों में बंट गया और मोहन बाबू के बुढापे की लाठी भी उनसे दूर हो गई |बुढापे में पूरे घर का बोझ अब मोहन बाबू और सुशीला के कन्धों पर आ पड़ा |उनका शरीर तो धीरे धीरे साथ देना छोड़ रहा था,कई तरह की बीमारियों ने उन्हें घेर लिया था , उपर से दोनों भावनात्मक रूप से भी टूटने लगे ,दिन भर बस अंशुल की बाते ही करते रहते ओर उसे याद करके आंसू बहाते रहते ,उधर बेचारा अंशुल भी माँ बाप से अलग हो कर बेचैन रहने लगा, यहाँ तक कि अपने माता पिता के प्रति अपना कर्तव्य पूरा न कर पाने के कारणखुद अपने को ही दोषी समझने लगा और इसी कारण से पति पत्नी के रिश्ते में भी दरार आ गई |समझ में नही आ रहा था की आखिकार दोष किसका है ?

रूपा अपने ससुराल से अलग हो कर भी दुखी ही रही ,यही सोचती रहती अगर मेरी सास ने मुझे दिल से बेटी माना होता तो हमारे परिवार में सब खुश होते, उधर सुशीला अलग परेशान ,वह उन दिनों के बारे सोचती जब वह बहू बन कर अपने ससुराल आई थी ,उसकी क्या मजाल थी कि वह अपनी सास से आँख मिला कर कुछ कह भी सके ,लेकिन वह भूल गई थी कि उसमे और रूपा में एक पीढ़ी का अंतर आ चुका है ,उसे अपनी सोच बदलनी होगी ,बेटा तो उसका अपना है ही वह तो उससे प्यार करता ही है ,उसे रूपा को माँ जैसा प्यार देना होगा अपनी सारी दिल की बाते बिना अंशुल को बीच में लाये सिर्फ रूपा ही के साथ बांटनी होगी| उसे रूपा को अपनाना होगा , शारीरिक ,मानसिक और भावनात्मक रूप से उसका साथ देना होगा ,देर से आये दरुस्त आये ,सुशीला को अपनी गलती का अहसास हो चुका था और वह अपने घर से निकल पड़ी रूपा को मनाने |

रेखा जोशी

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajiv Kumar Ojha के द्वारा
May 25, 2016

रेखा जी नमस्ते ! आपको बधाई। आपने सास -बहु सम्बन्धों के सच को बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दी है। जागरण जंक्शन पर मेरा ब्लॉग -सच के लिए सच के साथ शीर्षक से है। ब्लॉग लिंक -http ://rajivkumarojha.jagranjunction.com है। मेरा एक ब्लॉग -एक नजर अपने गुनाहों पर पढियेगा। अपनी बेबाक राय दीजिएगा। सादरी राजीव कुमार ओझा 09415376349

Rajiv Kumar Ojha के द्वारा
May 25, 2016

रेखा जी नमस्ते ! आपको बधाई। आपने सास -बहु सम्बन्धों के सच को बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति दी है। जागरण जंक्शन पर मेरा ब्लॉग -सच के लिए सच के साथ शीर्षक से है। ब्लॉग लिंक -http ://rajivkumarojha.jagranjunction.com है। मेरा एक ब्लॉग -एक नजर अपने गुनाहों पर पढियेगा। अपनी बेबाक राय दीजिएगा। सादर राजीव कुमार ओझा 09415376349

OM DIKSHIT के द्वारा
May 21, 2016

आदरणीया रेखा जी,नमस्कार.बेस्ट-ब्लॉग की बधाई. बहुत ही अच्छा लिखा है आप ने.आज का एक सामयिक -चिन्तन-विषय .मैं जवाहर जी की बात से भी सहमत हूँ.17 मार्च 2013 को मैंने इसी समस्या पर एक लेख लिखा था…….बहू मायके गयी है…..मुझे भी लगता है कि इस समस्या पर …हर परिवार को गम्भीर चिंतन करके ….सास-बहू क्या…. पूरे परिवार के कलह और क्लेश को दूर करने का प्रयास करना चाहिए….बाकी तो सब …ऊपर वाले के हाथ है.

    rekhafbd के द्वारा
    May 22, 2016

    हार्दिक धन्यवाद आ ओम जी ,सच में यह एक चिंतन का विषय है मे आपसे सहमत हूँ ,हार्दिक आभार

jlsingh के द्वारा
May 20, 2016

आदरणीया रेखा जी, सर्वप्रथम आपको साप्ताहिक सम्मान की बधाई! लघु कहानी में सन्देश स्पष्ट है ..काश की ऐसा हर परिवारों में हो पाता… फिर भी मुझे ऐसा जान पड़ा किरचना के हिसाब से इसे थोड़ा और समृद्ध बने जा सकता था. एकाध वार्तालाप, कटुता का कारन और निवारण होने से रचना और बेहतर हो सकती थी. यह मेरा अपना विचार है … आप उच्च कोटि की लेखिका हैं ..अच्छा लिखती रही हैं, इसीलिए मात्र सुझाव है मेरा सादर!

    rekhafbd के द्वारा
    May 22, 2016

    हार्दिक आभार आदरणीय जवाहर जी ,इस आलेख में मैने एक संदेश दिया है जो आपको पसंद आया ,सुझाव के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 20, 2016

रेखा जी सास बहू का रिश्ता बड़ा प्यारा होता है और परिवार खिल जाता है बशर्ते नजरिया बदल लिया जाए ..सुन्दर लेख .सप्ताह के बेस्ट ब्लॉगर के लिए बधाई भ्रमर ५

    rekhafbd के द्वारा
    May 22, 2016

    आदरणीय ,इतनी बढ़िया प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
May 20, 2016

रेखा जी साप्ताहिक सम्मान के लिए बधाई व इस महत्वपूर्ण लेख के लिए भी साधुवाद ।

    rekhafbd के द्वारा
    May 22, 2016

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद आ बिष्ट जी

rekhafbd के द्वारा
May 19, 2016

मुझे सम्मान देने पर जागरण जंकशन का आभार

Rajeev Varshney के द्वारा
May 10, 2016

बहन रेखा जी प्रभु से प्रार्थना है की आपकी कहानी के अंत जैसा ही सबके परिवारों में हो. सास को समझ आये की बहु ही मेरी बेटी है और बहु को भी समझ आये की सास ही मेरी माँ है. मेरे परिवार में जितनी भी बहुएँ है मै किसी से भी पैर नहीं छुवाता. मेरे लिए वो सभी मेरी अपनी बेटी के समान है.  सुन्दर भावनाप्रद रचना के लिए बधाई. सादर राजीव वार्ष्णेय  

    rekhafbd के द्वारा
    May 19, 2016

    हार्दिक धन्यवाद आदरणीय राजीव जी


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