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रही अधूरी कविता मेरी

Posted On: 5 Dec, 2015 Others,social issues,कविता में

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रही अधूरी कविता मेरी
खो गये शब्द कहीं
रही अधूरी कविता मेरी
सहिष्णु बन
पीड़ा झेल रही नारी अभी
ज़िंदगी के आईने में
दिख रही
छटपटाहट उसकी
हो रहे खोखले रूप
देवी दुर्गा और शक्ति के
कुचल रहा विकृत समाज
उफनती भावनायें उसकी
कट जाते पँख उसके
और जंजीर पड़ती पाँव में
घुट जाती साँसे
कोख में माँ के कभी
है रौंदी जाती कभी
कहीं अधखिली कली
धोखे फरेब मिलते उसे
प्यार के नाम से
बेच दी जाती कहीं
दलदल में
उम्र भर फंसने के लिये
स्वाहा कर दी जाती कहीं
दहेज की आग में
काँप उठती बरबस
असहिष्णुता भी
देख दशा नारी की

रेखा जोशी

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