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मेरी सतरंगी कल्पनायें

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उड़ती गगन में
मेरी सतरंगी कल्पनायें
झूलती इंद्रधनुष पे
बहती शीतल पवन सी
ठिठकती कभी पेड़ों के झुरमुट पे
थिरकती कभी अंगना में मेरे
सूरज की रश्मियों से
महकाती गुलाब गुलशन में मेरे
तितलियों सी झूमती
फूलों की डाल पे
दूर उड़ जाती फिर
लहराती सागर पे
चूमती श्रृंखलाएँ पर्वतों की
बादल सी गरजती कभी
चमकती दामिनी सी
बरसती बरखा सी कभी
बिखर जाती कभी धरा पे
शीतल चाँदनी सी
नित नये सपने संजोती
रस बरसाती जीवन में मेरे
मेरी सतरंगी कल्पनायें
.
रेखा जोशी

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
February 5, 2016

बहुत सुंदर, मनमोहक और कोमल भावनाओं से भीगी हुई कविता है यह आपकी रेखा जी । याद दिला गई बचपन, किशोरावस्था और यौवनारम्भ के दिनों में जागते स्वप्नों और कल्पनाओं की जब हवा में उड़ने को जी चाहता था, नित नई आशाएं अंतस में उमड़ती थीं और बावरा मन पल भर में ही न जाने कितनी दूरियां तय कर लेता था । आपकी इस छोटी-सी कविता की प्रशंसा के लिए उपयुक्त शब्द नहीं हैं मेरे पास ।

    rekhafbd के द्वारा
    May 25, 2016

    मनमोहक प्रतिक्रिया के लिए दिल से आभार आ जितेन्द्र जी


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