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सम्पूर्ण हुआ जीवन मेरा द्वार आ के तेरे

Posted On: 15 May, 2015 Others,social issues,कविता में

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अनुपम सौंदर्य
अलौकिक छटा देख
खुल गए द्वार अंतर्मन के
झंकृत हुआ मन
रूप नया देख
मै इस पार तुम उस पार
हो गए अब आर पार
मिलन नही यह धरा गगन का
आगोश में अब मै तेरे
पा लिया अमृत घट
सुधापान कर लिया मैने
एकरस होकर प्रभु अब
समाया रोम रोम मेरा तुझमे
बुझ गई प्यास जन्म जन्म की
नेह तेरा पा के
सम्पूर्ण हुआ जीवन मेरा
द्वार आ के तेरे

रेखा जोशी



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
May 17, 2015

सम्पूर्ण समर्पण और आत्म तृप्ति! भक्ति रस से सराबोर करती रचना!

    rekhafbd के द्वारा
    May 18, 2015

    आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार आ जवाहर जी


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