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बिन माँगे मोती मिले माँगे मिले न भीख

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क्यों बैठे तुम निठठ्ले
नहीं है कोई काम धाम
कर्म की महिमा को समझो
कर्म सुख की खान
मूढ़ बैठा चौखट प्रभु के
मांगे है दिन रात
कर्मयोगी बन कोई
करता है पुरुषार्थ
कहा कृष्ण ने अर्जुन से
ध्येय तुम्हारा है करना कर्म
फल की इच्छा त्याग
अर्पित कर सब कर्म प्रभु को
रख ह्रदय में आस
फलित होंगे कर्म तुम्हारे
रख खुद पे विश्वास
आस कह रही श्वास से
धीरज रखना सीख
बिन माँगे मोती मिले
माँगे मिले न भीख

रेखा जोशी

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

anilkumar के द्वारा
April 28, 2015

आदरणीय रेखा जी , गीता के कर्मयोग को मुखरित करती सुन्दर कविता के लिये अभिनन्दन । 

    rekhafbd के द्वारा
    April 29, 2015

    आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार अनिल जी


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