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सदियों पुराना विज्ञान आज के युग में -वास्तु

सदियों पुराने वास्तुशास्त्र को लेकर अक्सर मन में यह शंका उत्पन्न होती है ,”क्या वास्तव में आज के इस वैज्ञानिक युग में वास्तु का कोई महत्व है?” याँ फिर हम ऐसे ही अंधाधुन्द इसका अनुसरण कर रहे है ,हाँ इस विषय पर कोई शोध नही हुआ जिससे इसकी प्रामाणिता सिद्ध हो सके | इस शास्त्र को जानने की मुझ में भी जिज्ञासा उत्पन्न हुई ,वास्तुशास्त्र में लिखी कुछ बातों का मैने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेष्ण किया जिसे मै आप सब के साथ बांटना चाहती हूँ |
१ ऐसे कई क्षेत्र है जहाँ सदियों पुराना विज्ञानं ,आधुनिक विज्ञानं के साथ आश्चर्यजनक् रूप से एकरस हो रहा है |रंगों की दुनिया की ही बात करें तो इस में कोई दो राय नहीं ,कि रंगों का मनोवैज्ञानिक रूप से हमारे दिलोदिमाग पर आश्चर्यजनक रूप से असर पड़ता है |लाल रंग को ही लें ,जो की ऊर्जा का प्रतीक है ,वास्तुशास्त्र के अनुसार दक्षिण पूर्व दिशा रसोईघर के लिए निर्धारित की गई है जिसे अग्निकोण भी कहा जाता है |इसी तरह हरे रंग के लिए पूर्व दिशा निर्धरित की गई है ,हरा रंग विकास का प्रतीक है इसलिए इस दिशा में बच्चों का कमरा निर्धारित किया गया है ,वह इसलिए क्यों कि बच्चों के शारीरिक ,बौद्धिक व् मानसिक विकास पर इस रंग का और इस दिशा का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है|
२ पदार्थ विज्ञानं के अनुसार पूरी सृष्टि पञ्च तत्वों से बनी है ,अग्नि ,वायु जल, धरती और आकाश |हर तत्व का अपना एक रंग होता है और अपनी ही एक दिशा ,अगर किसी इमारत सही दिशा में में पञ्च तत्वों के अनुसार रंगों का सही दिशा में चुनाव किया जाये तो उसमें रहने वाले सभी लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़े गा |विज्ञानं के अनुसार हम जानते है की हर रंग की अपनी ही उर्जा होती है|अगर किसी स्थान पर रंगों को सही दिशा में नहीं रखा जाता तो रंगों से निकलने वाली तरंगो की ऊर्जा आपस में उलझ कर रह जाती है जिसके कारण वह उर्जा सहायक न हो कर विपरीत प्रभाव दे सकती है |इसलिए विभिन्न रंगों को अगर हम पञ्च तत्वों के अनुसार किसी भी इमारत में लगवाया जाए उस जगह पर ख़ुशी ,शांति और सम्पनता का वास रहे गा |
३ वास्तुशास्त्र में लिखा गया है कि सोते समय हमारा सिर दक्षिण दिशा की ओर और पाँव उत्तर दिशा में होने चाहिए ,वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह बिलकुल सही है क्योकि हमारी धरती भी एक चुम्बक है और भूगोलीय उत्तर की तरफ धरती का दक्षिण चुम्बकीय छोर है और भूगोलीय दक्षिण की तरफ धरती का उत्तर चुम्बकीय छोर है |भौतिक विज्ञान के अनुसार चुम्बकीय रेखाएं सदा उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर जाती है ,इससे यह ज्ञान होता है कि धरती की चुम्बकीय रेखाओं की दिशा भूगोलीय दक्षिण से भूगोलीय उत्तर की तरफ होती है | हम यह भी जानते है कि हमारे शरीर में बह रहे रक्त में लोहा भी होता है ,जिसके उपर चुम्बक का प्रभाव पड़ता है |जब हम भूगोलीय दक्षिण की तरफ सिर कर के सोते है तब हमारे शरीर के रक्त का प्रवाह और धरती की चुम्बकीय रेखाओं का प्रवाह एक ही दिशा में होता है जो हमे निरोग रखने में सहायक होता है ,अगर हम भूगोलीय उत्तर दिशा कि ओर सिर कर के सोयें तब हमारे शरीर के रक्त का प्रवाह धरती की चुम्बकीय रेखाओं के विपरीत होता है ,जिसके कारण रक्त सम्बन्धी बिमारियाँ हो सकती है |
ऐसे अनेक तथ्य वास्तुशास्त्र में लिखे हुए है जिसे प्रामाणित करने के लिए और उनकी वैज्ञानिक व्याख्या के लिए उन पर शोध होना जरूरी है |



Tags: लोहा   रक्त   छोर .भौतिकविज्ञान  

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
February 1, 2013

आदरेया रेखा जी सादर, सुन्दर जानकारी जो वास्तु को समझने में लगातार सहायक हो रही है. जीवन में कुछ सकारात्मक परिवर्तन के लिए दी गयी जानकारी के लिए बहुत बहुत आभार.

    rekhafbd के द्वारा
    February 1, 2013

    अशोक जी ,आपका हार्दिक आभार ,धन्यवाद

chaatak के द्वारा
January 30, 2013

रेखा जी, आपने अच्छी जानकारी दी है इस विषय पर और ज्यादा शोध और लोगों को इसकी जानकारी दोनों होनी चाहिए, यदि कोई पुराना ज्ञान हमें अच्छे परिणाम दे सकता है तो उसका विलुप्त होना सभी के लिए क्षोभ की बात होगी!

    rekhafbd के द्वारा
    February 1, 2013

    चातक जी आपका हार्दिक धन्यवाद

nishamittal के द्वारा
January 30, 2013

परन्तु रेखा जी उसका महत्व तभी समझ में आता है जब उस पर वाह्य ठप्पा लग जाता है,सही कहा आपने.

    rekhafbd के द्वारा
    February 1, 2013

    आदरणीया निशा जी ,आपने सही लिखा है जब तक बाहर का ठप्पा नही लगता लोगों को उसका महत्व समझ में नही आता ,आभार




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