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rekhafbd


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तुम मेरे पास रहो

Posted On: 17 Nov, 2016  
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Social Issues Special Days मस्ती मालगाड़ी में

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माटी के खूबसूरत दीये

Posted On: 26 Oct, 2016  
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Social Issues कविता मेट्रो लाइफ में

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इधर उधर लहराती मीन लहर लहर भाती

Posted On: 6 Oct, 2016  
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Others कविता मेट्रो लाइफ में

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के द्वारा: vikaskumar vikaskumar

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के द्वारा: jlsingh jlsingh

मेडम आपने आरभ अच्छे से शुरू किया हैं मगर बीच में आते आते आरक्षण और राजनीति को जोड़कर आरक्षण का विरोध करने का कारण बताया,     Other Backward Class (OBC) 27%        Scheduled Castes (SC) 15%              Scheduled Tribes (ST) 7.5%      इसके भीतर ही आरक्षण का सीमा सिमट जाता हैं, बाकी ५०% खुला है, आपने ही लिखा है, कोई किसीका स्वरूप नहीं बतला है, एक आकडे के अनुसार ४३% अनुसूचित जाति के लोगों को सही मात्र से सुविता(शिक्षा नौकरी, और कारोबार के मौका) नहीं मिलता है  इस का मुख्य कारन उन लोगों तक इस सुविता बहुचाने से रखने में आप जो लिखा है ///परम्पराएँ अभी तक कुछ लोगों की मानसिकता को आहत किये हुए है/// एक छोटी सी बदलाव यहाँ पर कुछ लोगों के जहां पर अधिक लोगो लिखना चाहिए. इस अधिक उच्चवर्ग के लोगों ने ही कारण है,  इस देश में समानता और जातिवाद मिटने के समय अपने आप आरक्षण भी समाप्ति हो जायेंगे एक सवाल है! सदियों पहले हिन्दू धर्म में जो वर्ण व्यवस्था बनाई गई थी, वह उस समय की आवश्यकता थी?? क्यों अवश्यकता थे, ज़रा विस्तार से बताएंगे! धन्यवाद

के द्वारा: rajesaravana rajesaravana

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के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

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के द्वारा: sanjeevtrivedi sanjeevtrivedi

रेखा जी यह समाज का सबसे दर्दनाक और घृणित पहलू है खासकर कन्या भ्रूण हत्या लेकिन ऐसे कृत्य जयादातर आज पढ़े लिखे शिक्षित लोग कर रहें हैं आपने ठीक लिखा है नवरात्रे आने पर कन्या की पूजा करो और अन्यथा कन्या को गर्भ में हीं मार डालो, इन सब घटनाओं को सुनने के बाद एक ही बात मन में उपजती है की आज का इन्सान दुर्गा माता जिनको शक्ति की देवी भी कहा गया है उनके साथ सौदे बाजी कर रहा है पूजा के बदले बेटे की मांग कर रहा है मन्नत का रिवाज भी तो अपने समाज में है यह क्या है ? सौदे बाजी ही तो है भगवान से माता से लोगों को शक्ति मांगनी चाहिए ना की बेटा या बेटी बेटियों के प्रति यह दोहरा चरित्र का प्रदर्शन आज लोग कर रहें हैं इसलिए मेरी राय में जयादा दोषी माताएं ही हैं क्यूंकि आखिर वे भ्रूण हत्या जैसे जघन्य पाप के लिए तैयार कैसे हो जातीं हैं इसके लिए सबसे दोषी हमारा विज्ञानं है जिसने ऐसी मशीनें इजाद की हैं की गर्भ में ही पता लगाया जा सकता है की होने वाली संतान बेटा है या बेटी हालाँकि मशीनों का इजाद इसके लिए नहीं हुवा था वह तो भले के लिए बना था जिससे गर्भवती स्त्री को कोई आंतरिक परेशानी होने से उसकी जांच की जा सके और सबसे प्रमुख कारण यह है की अगर बेटी पैदा हो गयी तो उसके लिए दहेज़ इकठा करना पडेगा जबकि बेटा दहेज़ ले आयगा यह भी एक कारन है जिसके लिए कन्या भ्रूण हत्याएं आज हो रहीं हैं और रुकने का नाम ही नहीं लेती आज तो लड़का और लड़की के लिंगानुपात में भी भारी कमी आई है शायद १००० लड़के के पीछे ९४० लड़कियों का ही औसत है जो की भविष्य के लिए एक सामाजिक समस्या का रूप लेने वाला है इस ओर भी लोगों का ध्यान नहीं जाता. क्षमा करेंगी मैंने कुछ ज्यादा ही लिख दिया क्यूंकि विषय ही ऐसा है आपने एक बहुत शिक्षाप्रद आलेख लिखा है हो सकता है इसको पढ़कर समाज में एक सकारात्मक सोंच आये . HAIN

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

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के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आज जाने माने लेखक सलमान रश्दी और लेखिका शोभा डे की देखा देखी कई उभरते हुए लेखक भी अब खुल कर अपनी लेखनी में हिंगलिश का प्रयोग कर रहे है| साईंस और टेक्नोलोजी में हो रही नित नई प्रगति के कारण जब आज पूरा विश्व सिमट कर पास आ रहा है ऐसे में हिंगलिश हर दिन एक नये आयाम की तरफ अपने कदम बढ़ा रही है , जहां आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में भी बिंदास ,तमाशा ,मेहँदी जैसे शब्द मिल जाते है वहीं अंग्रेजी के कई शब्द हमारी रोजमर्रा जिन्दगी का हिस्सा बन चुके है | एक तरफ तो हम कम्प्यूटर के दुवारा हिंदी शब्दों को अंग्रेजी में लिखकर दूर देश में बैठे ,हिंदी न लिखने वाले लोगों के साथ भी संवाद स्थापित कर सकते है तथा दूसरी ओर हम हिंगलिश दुवारा पूरी दुनिया में हिंदी ब्लागिंग की बढ़ती लोकप्रियता को बुलंदियों तक पहुँचाने में कामयाब हो सकते है| वक्त के साथ भाषा में बदलाव आता ही है और मुझे लगता है आना भी चाहिए ! बढ़िया लेखन आदरणीय रेखा जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

आज आज़ादी के छैयासठ वर्ष बाद भी हमारे देश के हालात दिन प्रतिदिन बिगड़ते जा रहे है ,हमारी संस्कृति के मूल्य ,संस्कार सब पीछे छूटते जा रहे है ,लोग संवेदनशून्य होते जा रहे है ,औरतों की अस्मिता खतरे में साँसे ले रही है ,हमारे नेता नित नये विवादों के घेरे में उलझ रहे है ,कमरतोड़ महंगाई आम आदमी को रोटी से उपर कुछ सोचने नही दे रही और इस देश का युवावर्ग भ्रमित सा दिशाविहीन हो रहा है .ऐसे में मेरा आव्हान है भारतीय नारी से की वह देश की भावी पीढ़ी में अच्छे संस्कारों को प्रज्ज्वलित करें ,उन्हें सही और गलत का अंतर बताये ,अपने बच्चो में देश भक्ति की भावना को प्रबल करते हुए राम राज्य के सुखद सपने को साकार करने की ओर एक छोटा सा कदम उठाये ,मुझे विशवास है नारी शक्ति ऐसा कर सकती है और निश्चित ही एक दिन ऐसा आयेगा जब भारतीय नारी दुवारा आज का उठाया यह छोटा सा कदम हमारे देश को एक दिन बुलंदियों तक ले जाए गा | | कोई चांस नहीं है आदरणीय रेखा जी ! अभी के हालत को देखकर कहें तो राम राज्य तो नहीं हाँ मुग़ल राज्य जरुर आ सकता है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

जब राम राज्य स्वर्ग के समान "शान्ति पूर्ण और समृद्ध " था,तो क्यों सीता माता की रक्षा के लिए श्री राम लक्ष्मण को छोड़ कर गए थे स्वर्ण-मृग के पीछे?. क्या श्री राम द्वारा स्वर्ण मृग का पीछा शिकार स्वर्ण रूपी संपदा के लिए जीव हत्या करना न था? क्यों एक भगवान् "स्वर्ण मृग रूपी छलावा" को नहीं पहचान सके ...जोकि तीनो लोकों की जानकारी रखते थे ? जबकि आज का साधारण से साधारण पुरुष ही क्या एक छोटा सा बच्चा भी सोने का मृग देखकर तुरंत समझ जाएगा कि या तो कुछ धोखा है,या अलौकिक शक्ति है . और जब राम राज्य शान्तिप्रद था,तो उसमें राक्षस और असुर क्या कर रहे थे ..................क्यों राम और लक्ष्मण को गुरु वशिष्ठ के आश्रम में "असुरों का दमन " करना पड़ा.? क्यों श्री राम को अपने जीवन में वार वार युद्ध करने पड़े?

के द्वारा: malik saima malik saima

लेख अच्छा,विचारणीय और प्रासंगिक है. पर हम पूछना चाहते हैं कि "किस राम राज्य की कल्पना साकार " करना चाहती हैं आप ? सचमुच राम जैसा परुशार्थ और जनकल्याण से परिपूर्ण थे और उनका राज्य भी अवश्य दर्शनीय रहा होगा . पर वैसा नहीं ......जैसा आप कल्पना कर रही हैं राम राज्य में "सामाजिक अव्यवस्था" भी निहित थी ,ऐसा शास्त्रों से सिद्ध होता है....और सचमुच स्वर्ग से इतर कोई सभ्यता नहीं,जहाँ पाप-पुन्य की संभावना न हो क्या ऐसा राम राज्य जहाँ एक पतिवृता स्त्री को समाज को अपना प्रमाण देने के लिए "अग्नि परीक्षा" देनी पड़ी हो......जहाँ निसहाय सीता माता रूपी स्त्री को अपने पुत्रों को लेकर जंगल में मनीषी के संरक्षण में कठिन जीवन यापन करना पड़ा हो ......................इन सब के बाबजूद एक क्षण उसके जीवन में ऐसा भी आना था,कि ऐसी पवित्र नारी को धरती में समान पड़ा ...............क्या ये राम राज्य चाहिए आपको ?

के द्वारा: malik saima malik saima

के द्वारा: deepak bisht deepak bisht

रेखा जी, पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ, सुभ्रा कुमारी चौहान की कविता से शुरू करके आपने नारी शक्ती का आह्वान किया है ! असल में नारी स्वयं में दुर्गा है अगर वह इस भय से बाहर आजाये की दुष्ट प्रवृति के शैतानो का दिल बहुत कमजोर होता है और उन्हें जरा कड़कती हुयी हुंकार लगाई जाय तो वे स्वयं के बचाव की सोचने लगते हैं ! ज़रा विवेक और साहस की जरूरत है ! तुलसी दास ने रामचरित्र मानस में इस चौपाय से स्पष्ट कर दिया है की "धीरज धरम मित्र और नारी, आपात काल परखेऊँ ये चारी" की पहले तो महिलाओं को साथ चलना चाहिए, दूसरा धीरज और विवेक से काम लेना चाहिए ! मेरा तो यहाँ तक सुझाव है की स्कूलों में लड़कियों को जुडो कराटे, सिखाया जाना चाहिए, ताकि वे आपात काल में अपना बचाव कर पांए ! लेख के लिए बधाई ! हरेन्द्र जागते रहो !

के द्वारा: harirawat harirawat

रेखा जी , आपने बहुत अच्छा लिखा है - वास्तव में शायद पहले से अधिक आज की स्त्री ताक़तवर है ; क्योंकि जहाँ पहले रण कौशल दिखातीं थी; वहीँ आज न केवल घर- गृहस्थी बल्कि विश्व के हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में - हर विभाग में ; जमीं से लेकर - अन्तरिक्ष तक अपनी शक्ति - हौसला का परिचय दे रहीं है . और महिलाओं की ऐसी स्थिति विश्व के हर कोनो में है और निरंतर आगे बढती ही जा रही है . सिर्फ कही कमजोर पड़ती है तो अपने कोमल तन को वहशी लोगों से बचाने में . उम्मीद करतीं हूँ कि - एक दिन ऐसा आयेगा और बहुत जल्द ही जब - स्त्रियाँ अपने भीतर " माँ दुर्गा " की शक्ति को सिद्ध कर लेंगी - और दानव रुपी -जनों से स्वयं तथा औरों की भी रक्षा कर सकेंगी . बहुत-२ शुभकामनाएं के साथ ... मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: rekhafbd rekhafbd

हमारे बुज़ुर्ग क्यों नही छोड़ पाते उस स्थान का मोह जहां उन्होंने सारी उम्र बिताई होती है ,शायद इसलिए कि हम सब अपनी आदतों के गुलाम बन चुके है और अपने आशियाने से इस कदर जुड़ जाते है कि उसी स्थान पर ,.उसी स्थान पर ही क्यों हम अपने घर के उसी कोने में रहना चाहते है जहां हमे सबसे अधिक सुकून एवं शांति मिलती है ,चाहे हम पूरी दुनिया घूम ले लेकिन जो सुख हमे अपने घर में और घर के उस कोने में मिलता है,वह कहीं और मिल ही नही पाता,तभी तो कहते है ”जो सुख छज्जू दे चौबारे ओ न बलख न बुखारे ” | आदरणीय अलका गुप्ता जी की प्रतिक्रिया देखि , बहुत कुछ कह दिया है उन्होंने ! बेहतरीन और व्यवहारिक लेखन दिया है आपने आदरणीय रेखा जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: rekhafbd rekhafbd

महिला और पुरुष दोनों ही इस समाज के समान रूप से जरूरी अंग हैं लेकिन हमारे धर्म में तो नारी का स्थान सर्वोतम रखा गया है , नवरात्रे हो या दुर्गा पूजा ,नारी सशक्तिकरण तो हमारे धर्म का आधार है । हमारे वेदों के अनुसार भी ‘जहाँ नारी की पूजा होती है ‘ वहाँ देवता वास करते है परन्तु इसी धरती पर नारी के सम्मान को ताक पर रख उसे हर पल उसका शोषण होता है ,उसे अपमानित किया जाता है | अर्द्धनारीश्वर की पूजा का अर्थ यही दर्शाता है कि ईश्वर भी नारी के बिना आधा है ,अधूरा है, लेकिन इस पुरुष प्रधान समाज में आज की नारी अपनी एक अलग पहचान बनाने में संघर्षरत है । जहाँ बेबस ,बेचारी अबला नारी आज सबला बन हर क्षेत्र में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने की जी जान से कोशिश कर रही है ,वहीं अपने ही परिवार में उसे आज भी यथा योग्य स्थान नहीं मिल पाया ,कभी माँ बन कभी बेटी तो कभी पत्नी या बहन हर रिश्ते को बखूबी निभाते हुए भी वह आज भी वही बेबस बेचारी अबला नारी ही है । सटीक लेखन आदरणीय रेखा जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

के द्वारा: rekhafbd rekhafbd

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सुंदर प्रस्तुति रेखा जी। यदि सख्त कानून बनेगा तो कुछ अंकुश जरूर लग सकता है ऐसी घटनाओं पर, लेकिन इन्हें पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता। इस  बात से सभी वाकिफ हैं। और ऐसी घटनाओं के लिए एक कारण भी जिम्मेदार नहीं है। इतिहास गवाह है कि ऐसी घटनाएं पहले भी होती रही। आज ज्यादा प्रचार हो जाता है। रावण ने सीता को उठाकर ले गया था। महाभारत काल में द्रोपती के चीरहरण का प्रयास किया गया। ऐसी तमाम घटनाएं हैं। फिर भी मैं यही कहूंगा कि ऐसी घटनाओं को सिर्फ संस्कारों से ही रोका जा सकता है। इसके लिए हर घर से ही बच्चों को संस्कारित करने के प्रयास होने चाहिए। तभी कुछ हद तक दुष्कर्म की घटनाओं पर अंकुश लग सकेगा। 

के द्वारा: bhanuprakashsharma bhanuprakashsharma

ऐसी विक्षिप्त घटिया मानसिकता वाले पुरुष अपनी दरिंदगी का निशाना उन सीधीसादी कन्याओं पर यां भोली भाली निर्दोष बच्चियों को इसलिए बनाते है ताकि वह अबोध बालिकाएं उनके दुवारा किये गए कुकर्म का भांडा न फोड़ सकें और वह जंगली भेड़िये आराम से खुले आम समाज घूमते रहें और मौका पाते ही किसी भी अबोध बालिका अथवा कन्या को दबोच लें | कानून बनाकर भी क्या होगा ? सबको मालुम है क़त्ल करने से फांसी हो जाती है , किसको दर लगता है ? अनेक कारणों से कानून का भय भी समाप्त होता जा रहा है । लोक व्यवहार में लोकलज्जा का भाव भी निरन्तर गिरावट की ओर अग्रसर है । अर्थ और काम की लालसा समस्त वर्जनाओं को तोड़कर अपनी सीमाएँ लाँघती जा रही हैं । अच्छी प्रस्तुति आदरणीय रेखा जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आपके कथन से पूर्णतया सहमति रेखा जी । हमारी परम्पराओं में स्त्री को सम्माननीय नहीं, वरन पूज्य माना गया है । देवियों का नाम स्वत: भगवानों से पूर्व सम्मान प्राप्त करता आया है । राधे-कृष्ण, सीता-राम एवं गौरी-शंकर हमारे संस्कारों में कुछ ऐसे रचेबसे से हैं, कि उन्हें अलग कर पाना किसी भी पुरुष के लिये असम्भव है । हमारी मान्यता रही है कि 'यत्र नार्यस्तु पूजयते, रमन्ते तत्र देवता' । इसका विधान ईश्वर के आदेशानुसार खुद विधि द्वारा किया गया है । प्रत्येक शास्त्रसम्मत विधान का आधार मर्यादित आचरण के साथ जोड़ा गया, जिसका पालन करना स्त्री और पुरुष दोनों के लिये अनिवार्य बनाया गया । यदि इनमें से कोई एक भी अहंकार अथवा अज्ञानतावश खुद को श्रेष्ठ और दूसरे को हेय या निकृष्ट समझने की भूल करता है, तो मर्यादा टूटती है, और मर्यादा टूटने से विधान का आधार खिसकने लगता है, वह पथ-भ्रष्ट होने लगता है । इस प्रवृत्ति की अधिकता पहले परिवार, फ़िर समाज रूपी संस्थाओं को कमज़ोर करते हुए उन्हें तोड़ने तक का कारक बन जाती है । बुद्धि-विवेक का इस्तेमाल, सही शिक्षा और समन्वयपूर्वक सह-अस्तित्व का यदि बोध हो, तो आरोप प्रत्यारोप की नौबत ही नहीं आए । गाड़ी के इन दोनों पहियों के छोटा या बड़ा अथवा किसी की प्रधानता का तो सवाल ही पैदा नहीं होता । क्या पहियों के आकार में मामूली सा अन्तर भी गाड़ी को चलने देगा ? नारी चूँकि प्राकृतिक रूप से पुरुष की अपेक्षा शारीरिक दुर्बलता के साथ पैदा होती है, अत: समस्त विधान भी दोनों की शारीरिक संरचना व स्वभाव आदि को दृष्टिगत रखकर ही बनाए गए हैं । आज के परिवेश में चूँकि हमारे शास्त्रसम्मत विधान गौण होकर हाशिये पर हैं, अत: ना-ना प्रकार की विसंगतियाँ भी पूरे समाज को झेलनी पड़ रही हैं ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: aman kumar aman kumar

यह सिर्फ़ आप, अर्थात आम जनमानस की भावनाएँ हैं रेखा जी, हमारी सुरक्षा का बार-बार ठेका लेनेवाले स्वयम्भू ठेकेदारों को ये भावनाएँ छू भी नहीं पातीं । उन्हें तो बस पब्लिक की एकजुटता ही थोड़ी बहुत विचलित करती है, वह भी तभी तक, जबतक भीड़ सड़कों पर दिखाई देती है । इन नराधमों में यदि ज़रा भी संवेदनाएँ शेष बची होतीं, तो वर्तमान बलात्कार कानून की मुँह चिढ़ाती कमज़ोरियों पर सर्वदलीय चर्चा से संसद की दीवारें तबतक गुंजायमान होती रहतीं, जबतक सभी मिलबैठ कर संशोधन के किसी ठोस नतीज़ों पर नहीं पहुँच जाते । इनकी संवेदनाओं को भ्रष्टाचार की दीमक ने चाल-चाल कर खोखला बना दिया है । यह सिर्फ़ इसी देश में सम्भव है रेखा जी, जहाँ सर्वाधिक वहशी दरिन्दे को नाबालिग होने का कथित सर्टीफ़िकेट रखने के कारण सज़ा के नाम पर मात्र फ़ेदर-टच देकर छोड़ दिया जाय, और कोई कोलाहल तक न मचे । अंग्रेज़ों ने जिन कानूनों को अपने कवच के रूप में निर्मित किया था, उन्हें ही ये देशी अंग्रेज़ भी अपने हक़ में इस्तेमाल करने के अभ्यस्त हो चुके हैं । संसद में बैठे कुछ प्रभावशाली बलात्कार के आरोपी भी कानून में कोई संशोधन न किये जाने के ही पक्षधर हैं । आज भी हमारा बहुसंख्य मतदाता आप ही की तरह भावुक अधिक है, जुझारू कम । यह स्थिति जब तक बरक़रार है, बुराइयों को खाद-पानी मिलता ही रहेगा । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

यह तो जंगल राज हो गया जिसकी लाठी उसकी भैंस ,जो अधिक बलशाली है वह निर्बल को तंग कर सकता है यातनाएं दे सकता है ,धिक्कार है ऐसी मानसिकता लिए हुए पुरुषों पर ,धिक्कार है ऐसे समाज पर जहां मनुष्य नही जंगली जानवर रहतें है |जब भी कोई बच्चा चाहे लड़की हो याँ लड़का इस धरती पर जन्म लेता है तब उनकी माँ को उन्हें जन्म देते समय एक सी पीड़ा होती है ,लेकिन ईश्वर ने जहां औरत को माँ बनने का अधिकार दिया है वहीं पुरुष को शारीरिक बल प्रदान किया ,हम सब इस बात को स्वीकारते हैं कि महिला और पुरुष इस समाज के समान रूप से जरूरी अंग हैं परन्तु हमे यह भी स्वीकारना पड़ेगा चाहे नर हो याँ नारी दोनों का अपना भी स्वतंत्र अस्तित्व है और उन्हें अपने अधिकारों, स्वतंत्रता और समानता या फिर अपनी सुरक्षा के लिए मांग करना किसी भी प्रकार से अनुचित नही है क्योंकि सच तो यही है ,महिला-पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं कम या अधिक नहीं। अब समय आ गया है सदियों से चली आ रही मानसिकता को बदलने का, नारी को शोषण से मुक्त कर उसे पूरा सम्मान और समानता का अधिकार दिलाने का ,ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां नारी पुरुष से पीछे रही हो एक अच्छी गृहिणी का कर्तव्य निभाते हुए वह पुरुष के समान आज दुनिया के हर क्षेत्र में ऊँचाइयों को छू रही है ,क्या वह पुरुष के समान सम्मान की हकदार नही है ?तब क्यूँ उसे समाज में दूसरा दर्जा दिया जाता है ?केवल इसलिए कि पुरुष अपने शरीरिक बल के कारण बलशाली हो गया और नारी निर्बल | अगर नारी अपनी सुरक्षा की मांग कर रही है तो सबसे पहले यह सोचना चाहिए ”सुरक्षा किससे मिलनी चाहिए ?”सुरक्षा हमारे समाज के उन जंगली भेड़ियों से मिलनी चाहिए जो दिखते तो मनुष्य जैसे है लेकिन अंदर से विक्षिप्त मानसिकता लिए हुए जंगली जानवर है जो मौका मिलते ही नारी को नोच खाने के लिए टूट पड़ते है |जब भी कोई जगली जानवर पागल हो जाता है तो उसे गोली मार दी जाती है ताकि वह कभी भी किसी को कोई नुक्सान न पहुंचा सके,लेकिन हमारे देश में तो यहाँ वहां ऐसे जानवर सरेआम घूमते हुए मिल जाएँ गे, न जाने कब और किस नारी को दबोच लें , चाहे वह दो तीन साल की अबोध बालिका हो याँ फिर सत्तर साल की माँ समान नारी हो | जब अपनी सत्ता हिलती है तो परेशानी तो होती है आदरणीय रेखा जी ! ये केस ऐसा है जिस पर जाने कितना लिखा गया लेकिन सवाल , बहुत सवाल अब भी उत्तर खोज रहे हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय रेखा जी,. सादर ! ""समाज दुवारा पीड़ित ,अपमानित ,बेबस नारी अपनी आँखों में आंसू भर कर ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकती है ,”काश यह धरती फट जाए और मै उसमे समा जाऊं |” . आप क्यों धरती में समायियेगा ? पुरुष समाज को कोसने से पहले सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठी उस अबला नारी से कोई क्यों नहीं अपील करता ? क्या सभी नारियों के पिता-भाई या अन्य पुरुष सदस्य सब के सब बलात्कारी और अत्याचारी हैं ? रेखा जी, नारियों ने अगर अनेक अच्छे कार्य कियॆ हैं तो उसका उन्हें श्रेय और सम्मान भी मिलता है, पर आज आपकी आँखों के सामने पतन के गर्त में पहुँची इतनी नारियां है, जिनकी गिनती नहीं हो सकती और आप इससे इनकार भी नहीं कर सकती ! सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: Malik Parveen Malik Parveen

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: rekhafbd rekhafbd

के द्वारा: vaidya surenderpal vaidya surenderpal

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आज भारत का हर घर दामिनी के साथ हुए गैंगरेप से भावनात्मक तौर से इस तरह जुड़ चुका है जैसे उनके अपने घर में ही यह खौफनाक हादसा हुआ हो ,हर घर की बहू बेटी आज अपने ही इस देश में अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रही है क्योंकि इस तरह के अपराध करने के बाद भी अपराधी खुले आम सडकों पर घूमता रहता है ,हैरानी की बात है कि सज़ा का व्यवधान होते हुए भी अपराधी कानून की ग्रिफ़्त से न जाने कैसे बच निकलते है |कितनी ही लडकियां बलात्कार जैसे शर्मनाक हादसे के बाद मौत को गले लगा लेती है ,उनके अपने माँ बाप भी उन्हें अपनाने से इनकार कर देते है ,तन मन और आत्मा तक से पीड़ित लड़की इस विक्षिप्त मानसिकता वाले समाज में बिलकुल अकेली और असहाय सी घुट घुट कर जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो जाती है ,क्या यही नारी सशक्तिकरण है ? ये शायद पहला ऐसा विरोध प्रदर्शन रहा होगा जिसमें कोई पार्टी शामिल नहीं थी और पार्टियों की चूलें हिल गयीं ! राष्ट्रपति भवन की तरफ मार्च करते लोग ( जिनमें मैं भी शामिल था ) नए हिंदुस्तान का अलग नजारा दिखा रहे थे और हर बढती संख्या , सामान्य जनता को हलके में लेने वाले राजनेताओं को उनकी असली औकात दिखा रही थी ! बहुत सार्थक लेखन आदरणीय रेखा जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun